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March 9, 2016
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Hum kabhi jab dard ke qissey sunaane Lag gaey

हम कभी जब दर्द के किस्से सुनाने लग गए लफ़्ज़ फूलों की तरह ख़ुश्बू लुटाने लग गए बेबसी तेरी इनायत है कि हम भी आजकल अपने आँसू अपने दामन पर बहाने लग गए Hum kabhi jab dard ke qissey sunaane … Continue reading

March 9, 2016
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Wo Ghazal padhne me’n lagta bhi Ghazal Jaisa tha

वो ग़ज़ल पढने में लगता भी ग़ज़ल जैसा था, सिर्फ़ ग़ज़लें नहीं, लहजा भी ग़ज़ल जैसा था ! वक़्त ने चेहरे को बख़्शी हैं ख़राशें वरना, कुछ दिनों पहले ये चेहरा भी ग़ज़ल जैसा था ! तुमसे बिछडा तो पसन्द … Continue reading

January 28, 2016
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Kabhi Shehro’n se guzrenge kabhi sehra bhi dekhenge

कभी शहरों से गुज़रेंगे कभी सेहरा भी देखेंगे, हम इस दुनिया में आएं हैं तो ये मेला भी देखेंगे । तेरे अश्कों की तेरे शहर में क़ीमत नहीं लेकिन, तड़प जाएंगे घर वाले जो एक क़तरा भी देखेंगे । मेरे … Continue reading

January 28, 2016
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Na Jannat Maine Dekhi hai Na Jannat ki Tawaqqo Hai

ना जन्नत मैंने देखी है ना जन्नत की तवक्क़ो है मगर मैं ख़्वाब में इस मुल्क का नक़शा बनाता हूँ मुझे अपनी वफ़ादारी पे कोई शक नहीं होता मैं खून-ए-दिल मिला देता हूँ जब झंडा बनाता हूँ نہ جنّت میں … Continue reading

January 17, 2016
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Ye darvesho’n ki basti hai yaha’n aisa nahi’n hoga

ये दरवेशों कि बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा, लिबास-ए-ज़िन्दगी फट जाएगा मैला नहीं होगा ! शेयर बाज़ार की क़ीमत उछलती गिरती रहती है, मगर ये खून-ए-मुफ़लिस है कभी महंगा नहीं होगा ! Ye darvesho’n ki basti hai yaha’n aisa … Continue reading

January 17, 2016
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Raat bhar jaagte rehne ka sila hai shayad

रात भर जागते रहने का सिला है शायद, तेरी तस्वीर सी महताब में आ जाती है | Raat bhar jaagte rehne ka sila hai shayad, Teri Tasveer si mahtab me’n aa jaati hai. Shayari by @Munawwar Rana

January 17, 2016
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Main issey pehle ke bikhru’n idhar-udhar ho jaau’n

मैं इससे पहले कि बिखरूं इधर-उधर हो जाऊं मुझे संभाल ले मुमकिन है दर-बदर हो जाऊं میں اس سے پہلے کہ بکھروں ادھر ادھر ہو جاؤں مجھے سنبھال لے ممکن ہے در بدر ہو جاؤں Main issey pehle ke bikhru’n … Continue reading

January 17, 2016
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Siyaast nafrato’n ka Zakhm bharne hi nahi’n deti

सियासत नफ़रतों का ज़ख्म भरने ही नहीं देती, जहाँ भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है ! Siyaast nafrato’n ka Zakhm bharne hi nahi’n deti, Jaha’n bharne pe aata hai tou Makkhi baith jaati hai. Shayari by @Munawwar Rana

December 22, 2015
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Chehron pe tabassum hi, sajane ke liye dekh..

चेहरों पे तबस्सुम ही,सजाने के लिए देख.. कुछ दिल की उदासी को छुपाने के लिए देख.. … मैं जागती आँखों की जुबान बन्द रखूँगा.. आंसू भी न अब मुझको बहाने के लिए देख.. …. मुद्दत से मेरी रूह पे एक … Continue reading