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इकबाल के शेर


खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले,
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।

(रजा – इच्छा, तमन्ना, ख्वाहिश)

जफा जो इश्क में होती है वह जफा ही नहीं,
सितम न हो तो मुहब्बत में कुछ मजा ही नहीं।

(जफा – जुल्म)

ढूंढता रहता हूं ऐ ‘इकबाल’ अपने आप को,
आप ही गोया मुसाफिर, आप ही मंजिल हूं मैं।

दिल की बस्ती अजीब बस्ती है,
लूटने वाले को तरसती है।

मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा चाहिए
कि दाना खाक में मिलकर, गुले-गुलजार होता है।

(मर्तबा – इज्जत, पद)

मुझे रोकेगा तू ऐ नाखुदा क्या गर्क होने से,
कि जिसे डूबना हो, डूब जाते हैं सफीनों में।

(1. नाखुदा – मल्लाह, नाविक 2. गर्क – डूबना 3. सफीना – नौका)

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।
(दीदावर – पारखी)

खुदा के बन्दे तो हैं हजारों बनो में फिरते हैं मारे-मारे
मैं उसका बन्दा बनूंगा जिसको खुदा के बन्दों से प्यार होगा

सितारों से आगे जहां और भी हैं
अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं

सख्तियां करता हूं दिल पर गैर से गाफिल हूं मैं
हाय क्या अच्छी कही जालिम हूं, जाहिल हूं मैं

(गाफिल – अनजान)

साकी की मुहब्बत में दिल साफ हुआ इतना
जब सर को झुकाता हूं शीशा नजर आता है

मुमकिन है कि तू जिसको समझता है बहारां
औरों की निगाहों में वो मौसम हो खिजां क